आख़िरी कप लिखते हुए, मैंने बार-बार अपने आस-पास के रिश्तों को देखा, अपने परिवार में, अपनी जान-पहचान में, और अपने भीतर भी। मैंने देखा कि कितने रिश्ते, जो कभी बहुत गहरे थे, धीरे-धीरे सिर्फ़ ज़िम्मेदारियों की एक सूची बनकर रह जाते हैं, बिल, समय-सारणी, रोज़ के काम। और मैंने यह भी देखा कि कितनी बार, बस एक छोटा-सा पल, एक पुरानी याद, किसी रिश्ते को फिर से जगा सकता है। एक चिकित्सक के रूप में, मैंने अनगिनत लोगों को शारीरिक रूप से स्वस्थ होते देखा है, पर भीतर से थका हुआ, अपने ही घर में अकेला महसूस करते हुए। यह किताब उन सभी के लिए है, जो कहीं न कहीं इस थकान को पहचानते हैं। माया और अर्जुन की कहानी मेरी अपनी नहीं है, पर उसमें वह सब कुछ है, जो मैंने वर्षों में महसूस किया, सुना, और समझा है। मुझे उम्मीद है कि यह कहानी आपको भी अपने किसी अपने की याद दिलाएगी, और शायद, उन्हें फ़ोन करने या गले लगाने की एक वजह भी देगी। स्नेह सहित,डॉ. राजश्री वर्मा डॉ. राजश्री वर्मा एक चिकित्सक, उद्यमी, लेखिका और प्रकाशक हैं, Vermaverse OPC Private Limited की संस्थापक-निदेशक और Vangmaya Publishing की संस्थापक। चिकित्सा विज्ञान की गहरी समझ और साहित्य के प्रति संवेदनशील दृष्टि ने उनकी लेखनी को एक विशिष्ट पहचान दी है। उनकी पहली कृति 'बंदिनी सुई से सिलिकॉन तक का महासफ़र' साहस और आत्मनिर्भरता की प्रेरक गाथा है। इसके बाद रहस्य-रोमांचक 'तीसवाँ द्वार विरासत का अंतिम रहस्य' ने इतिहास, विरासत और रहस्य को एक कथा में पिरोया। अब 'आख़िरी कप' के माध्यम से वे पाठकों को मानवीय रिश्तों, स्मृतियों और प्रेम की एक भावनात्मक यात्रा पर ले जाती हैं, जहाँ एक साधारण-सा चाय का कप भी जीवनभर की कहानी बन ज